सूद मूल रूप से एक क्षत्रिय समुदाय (अग्निकुल सोधा क्षत्रिय वंशज) हैं लेकिन परम्परागत रूप से
अधिकांश व्यापारी हैं। भारत में वे ज्यादातर हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाण, राजस्थान, जम्मू कश्मीर और
उत्तरी भारत के अन्य क्षेत्रों में हैं।
सूद शब्द संस्कृत के तीन अक्षरों सू$अत$अ से बना है जिसका अर्थ श्रेष्ठ आचरण करके उन्नति
करना है। अमरकोश के मुताबिक संस्कृत में ‘‘सूद’’ शब्द का अर्थ ‘‘दुश्मनों का विजेता’’ है।
सूद राजा परमार के दूसरे पुत्र को दिया गया नाम था, जिसे अमरक साम्राज्य (या उस समय
उमरकोट) दिया गया था। राजा सूद की मृत्यु के बाद उनके पुत्र मांजन राव सिंहासन पर आसीन हुए। मांजन
राव के बाद बाचीरा राव, रीज राव, अनिरूद्ध और अनाराव ने शासन किया था। इस अवधि के दौरान कुछ
भी महत्वपूर्ण नहीं हुआ और सूद ने पट्टन पर निर्विवाद शासन किया। अनाराव की मौत पर उनके बेटों
और रिश्तेदारों के बीच उत्तराधिकार का युद्ध छिड़ा जिसमें राजा किन राव विजयी हुए और सिंहासन पर
कब्जा कर लिया। हालांकि स्पष्ट रूप से उत्तराधिकार का सवाल तय किया गया था लेकिन सतह के नीचे बहुत
नाराजगी थी। हिंसा और युद्ध फिर शुरू हुआ राजा किन राखा गंधल की अध्यक्षता में भयंकर लड़ाई हुई
जिसके बाद राजा किन राव उनके आठ भाइयों के साथ मारे गए और राजा किन राखा गंधल ने युद्ध जीता।
राजा किन राव और उनके आठ बेटों की मौत के पर उनके शेष परिवार के सदस्यों और कुछ अन्य रिश्तेदारों
ने पट्टन छोड़ दिया और मारू (राजस्थान) देश को चले गए। इस प्रकार महाराज सूद के वंशज दो समूहों में
विभाजित हो गए। एक का नेतृत्व गंधल पट्टन में रहा और दूसरे का मारू देश में। गंधल और उनके बेटों ने
लगभग 50 वर्षों तक पट्टन पर शासन किया। यादव और अमरावली के राजाओं ने उन पर हमला किया
और वे सभी पराजित हो गए और मारे गए। इस प्रकार सूद शासकों ने पट्टन खो दिया। जो लोग जीवित बचे
वे गंगा और यमुना की घाटियों में चले गए और वहां बस गए। राजा किन राव के पुत्रों ने मारवाड़ के एक बड़े
क्षेत्र पर विजय प्राप्त की और अमरकोट के साथ अपनी राजधानी के रूप में शासन शुरू कर दिया। राजा
किन राव के बेटे जचक राव और पोते तिरी राव इस क्षेत्र में अपनी पकड़ स्थापित करने में सक्षम रहे। तिरी
राव के पुत्र राणा जगदेव ने अपने राज्य को पूरे सिंध ओर पंजाब के एक बड़े हिस्से तक कश्मीर समेत पंजाब
से कराची तक और सतलुज नदी से लेकर सिंधु तक बढ़ाया। उन्होंने अपनी राजधानी अमरकोट से अलवर
में स्थानान्तरित कर दी।
331 ईसा पूर्व में पोरस को पराजित करने के बाद सिंकदर को ब्यास नदी के तट पर भारत में प्रवेश
के लिए राय शाह सूद की श्रेष्ठ शक्तियों द्वारा कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा था। यह घटना सिंकदर के
संस्मरणों में और भारतीय इतिहास की किताबों में भी दर्ज की गई है। सिंकदर ने सूद राजाओं की शासकीय
गुणवत्ता को पहचाना और वैदिक धर्म के सिद्धान्तों, बहादुरी और अभ्यास के उनके सख्ती से पालन की
प्रशंसा की। सिंकदर की मृत्यु के बाद सूद राजाओं ने कुछ समय तक निर्बाध शासन किया और अपने क्षेत्र
और प्रभाव को अलवर, कश्मीर, कंधार, सिस्तान और दूसरी तरफ यमुना तक बढ़ा दिया, राज्य को कराची तक भी बढ़ाया गया था। कराची बन्दरगाह सूद राजाओं के अधीन आने से भारतीय व्यापारियों ने अपना
व्यापार इराक, तुर्की और यूनान तक फैला लिया।
विभिन्न सूद रानियों और विशेष रूप से रानी शुब देवी सूद का नाम एक अच्छे शासक के रूप में
प्रसिद्ध है, जो शिक्षित थी और अपने राज्य के प्रशासन में गहरी दिलचस्पी लेती थी। वह राजाओं की भान्ति
पूरी तरह सशस्त्र घोड़ों की सवारी करती थी और युद्ध में जाती थी। राजपूत महिलाओं द्वारा उस समय
‘सती’, ‘जौहर’ या आत्मविसर्जन प्रचलन में था। उस समय प्रचलित परिस्थितियों के संदर्भ में, शाही
महिलाओं द्वारा राजा की मृत्यु के बाद अपने व परिवार के सम्मान को बचाने के लिए यह स्वैच्छिक उत्सर्ग
बहादुरी का कार्य था। इतिहास बहादुर सूद महिलाओं द्वारा निर्धारित कई ऐसे उदाहरणों से भरा हुआ है।
सूद राजा धर ने इलफी नामक बसरा से एक मुसलमान को शरण दी जो बाद में एक गद्दार निकला।
उसने स्थानीय बौद्धों और लोहाना जाटों के साथ हाथ मिलाकर सूद सम्राट के खिलाफ विद्रोह का आयोजन
किया। बड़ी उथल-पुथल के बाद इस विद्रोह के शुरू में कुचल दिया गया था लेकिन बाद में मोहम्मद बिन
कासिम ने भारत पर आक्रमण किया और राजा धर सूद को भयंकर युद्ध के बाद हरा दिया। बाद में राणा
हामिद सूद ने 1143 ई. में भयंकर गारिल्ला युद्ध लड़कर फिर से अमरकोट के नियंत्रण को स्थापित किया।
इसके बाद भारत पर मुगलों का शासन शुरू हो गया।
मुगल सम्राट हुमायूँ को 1538 ई. शेरशाह सूरी के हाथों पराजित होना पड़ा जिसके बाद हुमायूँ ने
अमरकोट के राजा राय प्रशाद सूद के पास शरण ली। यह घटना तजाक-ए-हुमायूँ में दर्ज की गई है। यहां पर
प्रसिद्ध मुगल राजा अकबर का जन्म हुआ था। हुमायूँ को काबुल में ले जाया गया जहां से उसने बाद में दिल्ली
के सिंहासन को पुनः प्राप्त कर लिया। उसने राणा राय प्रसाद सूद को दिल्ली में आमंत्रित किया और उन्हें
सम्मानित किया। अकबर अगले सम्राट बने और सूद राजाओं के प्रति उच्च सममान रखते थे तथा कभी भी
उनके साथ सीधे संघर्ष में नहीं पड़े। मुगलों के साथ दुश्मनी तब शुरू हुई जब दीवान हरि सिंह सूद ने अकबर
की ताकतों के खिलाफ चित्तौड़ की सहायता की थी। बाद में राजा दिवान हरी सूद की सेना मुगलों से हार गई।
इस हार के बाद सूद समुदाय सिंध, मेवाड़ और पंजाब में फैल गया। राणा चग्गा चित्तौड़ चले गए और उन्हें
पंजाब में एक ‘जगीर’ दी गई जिसे सूदगढ़ के नाम से जाना जाता था, जिसे बाद में सरहिंद के नाम से जाना
गया। बाद में अमरकोट को राणा जग्गा के पुत्र ने पुनः प्राप्त कर लिया।
सरहिंद में विस्थापित होने वाले सूदों को शाही राजपूत परिवारों को अपने बेटों और बेटियों की शादी
करने में कठिनाई होती थी। उनके रीति रिवाजों, कपड़े और गहने उस क्षेत्र के अन्य हिन्दुओं से अलग थे।
उनके चेहरे पर बहादुरी के संकेत थे। वे विभिन्न जातियों में विभाजित होने लगे और उन्होंने अन्र्तजातिय
विवाह शुरू कर दिये। मूल रूप से सूदों की 52 उप जातियां थीं जिनके नाम राजा, राज्य या गांव के नाम पर
थे। जैसे गोपाल उपजाति गोपाल सरू (सघरन के राजा) मण्डल, उरजा के राजा मण्डल विन रेख सिंह, जमेर
के राजा ददन विन वरजर के नाम पर दद्दन, भारवर के राजा उगल सिंह के नाम पर उगल तथा मालसी के
राजा पासी सिंह के नाम पर पासी उपजाति का नाम पड़ा। सूद हमेशा से ही रईस व सफल थे। वे अपने बच्चों
के विवाह को ज्यादा प्रचारित नहीं करने के लिए प्रसिद्ध थे। सभी सूद अपने विवाह में जोड़े को 10 रूपये और 10 ईंटे देते थे। इसलिए हमेशा ईंट निर्मित घरों में रहते थे।
जब राजा मानसिंह कछवाहा को मुगल सम्राट द्वारा काबुल का गर्वनर नियुक्त किया गया तो उन्होंने
सरहिन्द का दौरा किया और 5000 सूद योद्धाओं के साथ पठानों को पराजित किया। युद्ध से लौटने पर
सूद यौद्धाओं को लाहौर, आगरा और पाक पट्टन में गर्वनर नियुक्त किया गया।
अहमद शाह अब्दली ने सात बार भारत पर हमला किया और हर बार सरहिंद उसका लक्ष्य था
क्योंकि यह एक महत्वपूर्ण व्यापार केन्द्र था और दिल्ली के रणनीतिक मार्ग पर था। बार-बार आक्रमण के
कारण इसे शापित शहर के रूप में जाना जाने लगा था। निरंतर लूट और अस्थिरता से ग्रसित हो, सूद
समुदाय के लोगों ने पहाड़ी इलाकों में प्रवास करना शुरू कर दिया और 52 अलग-अलग जातियों में बंट
गए जोकि आमतौर पर उनके गांव व बजुर्गों के नाम पर थीं। इसलिए आज हिमाचल के विभिन्न क्षेत्रों में
सूदों की बहुतायत है।
इतिहास के अनुसार मुगुल शासकों द्वारा इस्लाम में परिवर्तित होने से इंकार करने पर हिन्दुओं को
जिंदा दफनाया गया था। सरहिंद में गुरू गोबिंद सिंह के दो बहादुर पुत्रों को दीवार में जिंदा दफनाया गया
था। उस समय सरहिंद की हिन्दू आबादी में कई सूद शामिल शामिल थे। सारी भूमि मुस्लिम शासकों से
सम्बन्धित थी। उनके डर से गुरू गोविन्द सिंह के शहीद पुत्रों के अन्तिम संस्कार के लिए जमीन देने के लिए
कोई भी राजी नहीं था, तब सरहिंद के श्री टोडरमल सूद व अन्य सूद परिवारों ने उनके पुत्रों के संस्कार
करने के लिए पर्याप्त जमीन पर सोने के खड़े सिक्के बिछा कर अत्यधिक कीमतों पर जमीन खरीदी। इस
घटना के बाद मुसलमान शासक सूद समुदाय से बैर रखने लगे और सूदों को सरहिंद छोड़ना पड़ा।
तब अपनी आजीविका कमाने के लिए मेहनत से हर एक काम को अपनाया। कुछ ने कृषि,
साहूकारी और सम्पत्ति प्रबन्धन का काम अपना लिया। इस समय तक मुगल शासन अपने आखिरी दौर पर
था और अंग्रेजों ने भारत प्रवेश कर लिया था। 1886 के आसपास कुछ सूद विदेश चले गए। 1900 की
शुरूआत में कई सूद परिवार पूर्वी अफ्रीका और दुनिया के अन्य हिस्सों में जाकर बस गए। उन्होंने
ब्रिटिशों के साथ पूर्वी अफ्रीका के प्रशासन में एक बड़ा योगदान दिया।
जलियाँवाला बाग प्रकरण 1919 में सूद समुदाय की मुख्य भूमिका रही, क्योंकि डाॅ. गुरूबक्श राय
सूद ने इस बैठक की अध्यक्षता की थी और वह मुख्य आयोजक भी थे। जनरल डायर द्वारा हुए भीषण
नरसंहार में कई सूदों ने अपना जीवन बलिदान कर दिया। 1947 में भारत के विभाजन पर सूद समुदाय ने
हमेशा की तरह एक और विस्थापन झेला।
1881 में एक सूद सहायक सभा का गठन लाहौर में हुआ जिसने बंटे हुए सूद समुदाय को इकट्ठा
करने का सफल प्रयास किया और समय-समय पर अन्य शहरों में भी सूद सभाएं बनीं जिन्होंने आगे
चलकर सूद समुदाय के लिए कार्य किए।
भागड़ा परिवार व जठेरी माता के इतिहास का संक्षिप्त विवरण
जैसाकि सूद वंश के इतिहास में वर्णित है कि अपने बेहतर भविष्य के लिए सूद एक स्थान से दूसरे
स्थान पर विस्थापित होते रहे। पहले सिन्ध, पट्टन, राजस्थान और फिर सरहिंद में सूद समुदाय के लोग
स्थापित हुए। मुगलों के अत्याचार से त्रस्त सूद वंश के लोग सरहिंद से भी विस्थापित होकर हिमाचल के
पहाड़ों में ओर पंजाब के मैदानों में बस गए। प्रारम्भ में सूद विरादरी 52 उप जातियों में बंट गई जोकि उनके
गांव, वजुर्ग राजा या शहर के नाम पर प्रचलित हुई। अधिकांश अपने गांव के नाम से जानी जाने लगीं। जैसे
बजवाड़िया, महदूदिया, जलंधरी, जंदरांगलू, बंटा, पलकैया, लुसाड़िया, इसी प्रकार भागड़ा परिवार का नाम
भी भगड़ा नामक स्थान पर रहने से प्रचलित हुआ। भगड़ा, लोहारा के अन्तर्गत ही छोटा सा गांव है। सन्
1995 में हमारी जठेरी इसी भगड़ा गांव में स्थापित थी। आज से लगभग दो ढ़ाई सौ वर्ष पहले सरहिंद से
विस्थापित होकर हमारे वजुर्ग यहीं आकर बसे थे। यहां पर बसने के बाद हमारे वजुर्गाें ने हरड़ों का व्यापार
शुरू किया। परिवार में चार भाई थे। दो भाई गरली और पकलोह (ज्वालामुखी) से हरड़ें इकट्ठी करके लाते
थे। तीसरा भाई लोहारा में भट्टियों में इन्हें भूनता था और चैथा भाई होशियारपुर पहाड़ी कटड़े में इन्हें
बेचता था। और इस तरह चारों भाई अपनी-अपनी जगह स्थापित हो गए। आज जितने भी परिवार चाहे वो
शिमला, दिल्ली, पालमपुर, ज्वालामुखी, होशियारपुर, रक्कड़, परागपुर, जैजों, गरली इत्यादि स्थानों पर हैं वह
सभी समय-समय पर लोहरा से ही जाकर उन स्थानों पर बसे हैं।
जैसाकि हमारे वजुर्ग बताते थे कि हमारे भागड़ा परिवार का एक सदस्य जम्मू राज्य में उच्च पद पर
आसीन था। जम्मू से लोहारा वापिस आते हुए उसका मुकाबला लूटेरों से हो गया और वो लड़ते हुए शहीद हो
गए। उसकी नवविवाहिता स्वयं अपनी इच्छा से पति की चिता में सती हो गई। कुछ समय बाद इस प्रकार दो
घटनाएं और हुईं। उसमें उस समय के प्रत्यक्षदर्शीयों के सामने जब सती चिता पर बैठने लगी तो उसके चेहरे
व ललाट पर आलौकिक चमक उभरी और वो अग्नि में समा गई। तीसरी घटना में भी जब सती चिता पर
बैठी तो सती ने अपनी एड़ियां रगड़-रगड़ कर अग्नि प्रचण्ड की और स्वयं अग्नि में समा गई। और ये तीनों
सती देवियों के रूप में मन्दिर में प्रत्यक्ष विराजमान हैं। जठेरी अथवा जठेरे का अर्थ सती, पूर्वज, वजुर्ग या
पितर भी होता है। सभी भागड़ा परिवार के सदस्यों का गोत्र गर्ग है।
वजुर्गों के अनुसार जब हमारा परिवार भगड़ा में रहता था उस समय अम्ब के राजा की शादी जम्मू
में हुई और जो लोग जम्मू से रानी का दहेज पण्डों के रूप में लेकर आए थे उन्हें राजा ने भगड़ा में बसा दिया
और हमारे परिवारों को लोहारा में रहने के लिए जगह दे दी।
भगड़ा में जो राजपूत परिवार रहते हैं उन्हें आज भी पान्डू कहते हैं और हमारे परिवार लोहारा में
जहां बसे उसे सूदां दी बस्ती कहते हैं। आज हमारा जठेरी माता का मन्दिर इसी स्थान पर स्थित है।
सन् 1995 से पहले मन्दिर भगड़ा में पुराने स्थान पर स्थित था वहां पर आवागमन का कोई साधन
नहीं था। जगह वीरान थी और छोटा सा मन्दिर भी जर्जर हालत में था। उस प्राचीन जगह को सुधारने की
भागड़ा परिवार व
हमारे वजुर्गों ने कई बार कोशिश की परन्तु वहां देखभाल करने के लिए कोई उचित व्यवस्था न थी। एक बार
तो गरली के एक परिवार ने मन्दिर की मूर्तियों को उठाकर ले जाने की कोशिश की थी परन्तु लाख कोशिश
करने के बाद भी मूर्तियों को हिलाना तक सम्भव नहीं हो सका था।
सन् 1993 में स्व. लाला देवराज जी के लोहारा स्थित घर पर भागड़ा परिवारों की दो तीन बैठकें
हुईं। पुराने स्थान पर भी मन्दिर बनाने का विचार हुआ परन्तु वहां पर उपयुक्त जगह उपलब्ध न हुई और
बहुत सोच विचार कर सर्वसम्मति से मन्दिर को सूद बस्ती में स्थापित करने का निर्णय हुआ। वजुर्गों, पंडितों
व विद्वानों की राय ली गई। जठेरी माता की आज्ञा के बिना यह कार्य असम्भव था। हमारे वजुर्ग एक पंडित के
पास गए। पंडित ने माता का आहवान किया और माता ने कहा कि मैं यहां से जाने को तैयार हूँ और खुश हूँ।
और इस इस वीरान जगह पर उदास हूँ, मुझे यहां से पूरे आदर सत्कार, बैंड बाजों के साथ पालकी में
बिठाकर हलवा व चने बांटते हुए लेकर जाना। जब बहां से मूर्तियों की सजी हुई पालकी में विराजमान किया
जा रहा था तो वहां पर अनेक आलौकिक घटनाएं हुईं। वहां उपस्थित एक व्यक्ति में माता प्रवेश कर गई
उसके माध्यम से माता ने अपने चलने का समय, विधि विधान बताया। और हम सब ने वैसा ही किया। पुराने
स्थान से नवनिर्मित मन्दिर की दूरी लगभग 2.3 कि.मी. है। जब माता की मूर्तियों को पालकी में रखकर ले
जाने लगे तो पालकी का भार बहुत लग रहा था और उठा कर चलने में कठिनाई हो रही थी परन्तु जैसे ही
पालकी मन्दिर के पास पहुंचने लगी तो भार बिल्कुल फूलों की तरह हल्का हो गया। उस समय धूप होते हुए
भी इन्द्र देवता ने प्रसन्न होकर वर्षा कर दी और जय जठेरी माता के नारों से मन्दिर परिसर गूंजने लगा।
परम्परानुसार भागड़ा परिवार में बच्चे के जन्म पर उसके मुण्डन संस्कार पर और परिवार में शादी होने पर
परिवारिक सदस्य इकट्ठे होकर जठेरी माता के दर्शनों को आते हैं।
ट्रस्ट का गठन एवं कार्य
सन् 1993 में लोहारा में सर्वसम्मति से नया मन्दिर बनाने का निर्णय हुआ। जिस स्थान पर मन्दिर व
सराय निर्मित है वह सारी जमीन स्व. श्रीमती रोशनी देवी सूद सुपुत्री स्व. श्री रामदित्ता मल भागड़ा निवासी
लोहारा ने दान की है। उस समय जठेरियों की मान्यता कुछ परिवारों तक ही सीमित थी। कई परिवार व नई
पीढ़ी तो इस बारे में बिल्कुल अन्जान थी। मन्दिर कार्य सुचारू रूप से चलाने के लिए 1994 में मन्दिर कमेटी
का गठन हुआ। होशियारपुर से स्व0 श्री कपिल सूद, स्व0 श्री रेवती रमन सूद, स्व0 श्री हरवंस लाल जी
भट्ठे वाले, स्व0 श्री मनेाहर लाल सुपुत्र स्व0 श्री लब्बू राम जी, श्री शेषपाल जी जेजों से स्व0 वैद्य पिशौरी
लाल जी, रामपुर बुशैहर से स्व0 श्री कुलदीप सूद जी का कमेटी गठन में मुख्य योगदान रहा था। स्व0 लाला
देवराज सूद जी को सर्वसम्मति से अध्यक्ष व श्री सूदेश सूद जी को कमेटी का सचिव चुना गया। इन दोनों की
जोड़ी के अथक प्रयासों से समस्त भागड़ा परिवारों की भावनाएं जठेरी माता से जुड़ने लगी। भागड़ा परिवारों
के घर-घर जाकर उन्हें जठेरी माता से जुड़ने के लिए प्रेरित किया। सन् 1999 में कमेटी को एक ट्रस्ट के रूप
में पंजिकृत कर दिया गया। वर्तमान में श्री जठेरी माता सूद-भागड़ा परिवार का मन्दिर व परिसर एक रमणीक
एवं सुरम्य स्थान बन चुका है व सभी भागड़ा परिवार की आस्था व श्रद्धा का केन्द्र है। यहाँ आने वाले
श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक व आलौकिक आनन्द की प्राप्ति होती है।
आरम्भ से ही जठेरी माता के आदेश के अनुसार ही सारे काम ट्रस्ट द्वारा किए जा रहे हैं और माता
के आर्शीवाद से ही सब कार्य निर्विघन रूप से सम्पन्न होते जा रहे हैं। भागड़ा परिवार के समस्त सदस्यों का
आपसी सहयोग सराहनीय है व एक विशेषता यह भी है कि जब भी कोई निर्णय लिया जाता है तो सभी सदस्य
बिना किसी प्रश्नचिन्ह के इसे पूरा करने में तन मन धन से जुट जाते हैं। इसी विश्वास के कारण ट्रस्ट मन्दिर
निर्माण कार्य व अन्य सामाजिक कार्यों का निर्वहन बड़े अच्छे ढंग से कर पा रहा है। यही कारण है कि हमारा
मन्दिर व ट्रस्ट की कार्यप्रणाली अन्य सूद उपजातियों के लिए भी प्रेरणास्रोत है।
आज तक जो कार्य ट्रस्ट द्वारा किए गए हैं उनकी सूची बड़ी लम्बी है परन्तु मुख्य कार्यों का वर्णन
इस प्रकार है:
मन्दिर निर्माण व मूर्ती स्थापना के बाद सराय हाल, कमरा रसोई, शौचाालय इत्यादि का निर्माण
किया गया। 24 घण्टे पानी की आपूर्ति का प्रबन्ध 1999 मंे ही कर लिया गया था। मन्दिर परिसर की
चारदीवारी व मन्दिर तक पहुंचने के लिए सड़क का निर्माण ट्रस्ट द्वारा किया गया। मुख्य गेट बनाया गया,
एक कमरा, हाल व अन्य शौचालयों का निर्माण किया गया। पूरे मन्दिर में मारवल व टायल का काम
करवाया गया। मन्दिर परिसर में पौधा रोपण व सौदर्यकरण का कार्य किया गया। मन्दिर के साथ लगती
जमीन भी बाद में खरीदी गई और उस जगह पर एक सामुदायिक भवन का निर्माण किया गया है। जिसे
समय-समय पर गांववासी इस्तेमाल करते हैं। इसी के साथ एक बड़ा पार्किंग स्थल बनाया गया है। मन्दिर की
आन्तरिक सज्जा का काम भी समय-समय पर हो रहा है। जहां पर माता की मूर्तियां विराजमान हैं उसको भी
भव्य रूप दिया गया है।
सामाजिक कार्यों में गाँव में हर वर्ष गरीब लड़कियों की शादी में आर्थिक सहायता, सामान व कपड़े
इत्यादि दिए जाते हैं। गरीबों को इलाज व बच्चों की पढ़ाई में भी आर्थिक सहायता दी जाती है। कई बार स्कूल
में बच्चों को वर्दियां व जूते भी बांटे जाते हैं। मन्दिर के केयर टेकर राकेश भाटिया के दोनों बच्चों की उच्च
शिक्षा की जिम्मेदारी भी ट्रस्ट ने ले रखी है। उनकी फीस, किताबें, टयूशन, आने जाने का किराया भी ट्रस्ट
द्वारा ही वहन किया जाता है।
हर वर्ष फरवरी के प्रथम रविवार को विशाल भण्डारे का आयोजन किया जाता है। पिछले कई वर्षाें
से हर वर्ष मेडिकल कैम्प, दन्त चिकित्सा शिविर लगाए जाते रहे हैं। जिसमें गांव के लोगों को मुफ्त चिकित्सा,
फ्री दवाईयां, व्रुश, टूथपेस्ट इत्यादि बांटे जाते हैं। हमारे परिवार की दो युवा डाॅ. कनिका सूद व डाॅ. गरिमा
सूद इन चिकित्सा शिविरों में सेवाएं दे रही हैं। श्री अनिल सूद (ट्रस्टी) होशियारपुर से कई वर्षों से दवाईयांे की
सेवा कर रहे हैं। गत 10.12 वर्षांे से भण्डारे की पिछली रात्री शनिवार को हमारे प्रधान लाला मनोहर लाल
सूद के परिवार के सौजन्य से महामाई का जागरण (माता की चैकी) होता है जिसमें देश के सुप्रसिद्ध जागरण
कलाकार श्री सन्दीप सूद (भागड़ा) होशियारपुर महामाई का गुणगान करते हैं। मन्दिर ट्रस्ट हर वर्ष भागड़ा
परिवार के पूर्वजों, पितरों के निमित बड़ी श्रद्धा से अमावस्या के श्राद्ध का आयोजन करता है। जिसमें
पितृशान्ति का हवन होता है व ब्राह्मणों को भोज, दान दक्षिणा इत्यादि दिए जाते हैं। श्रद्धालु परिवारों द्वारा
समय-समय पर भागवत कथा, रामकथा व दुर्गासप्तशती पाठ का आयोजन भी किया गया। उच्च कोटि के
कथाकारों के वचन सुनकर गांव वासियों व पारिवारिक सदस्यों ने परम आनन्द का अनुभव किया। ट्रस्ट द्वारा
मन्दिर की देखभाल के लिए केयर टेकर राकेश भाटिया फोन नं. 98168.15586 व नियमित पूजा के लिए
पं0 जोगिन्द्र लाल फोन नं0 98172.07639 उपलब्ध रहते हैं। अगर किसी ने विशेष पूजा हवन इत्यादि
करवना हो तो पं0 विनोद शर्मा फोन नं0 98164.64203 से भी सम्पर्क कर सकते हैं।